Author: BhaktiParv.com
भूमिका
श्रीमद्भगवद्गीता का चतुर्थ अध्याय — “ज्ञान योग (सांख्य मार्ग का सार)” — गीता के सबसे महत्वपूर्ण और दार्शनिक अध्यायों में से एक है।
यहाँ भगवान श्रीकृष्ण अवतारवाद, सत्य ज्ञान, निष्काम कर्म और गुरु-शिष्य परंपरा का रहस्य बताते हैं।
यह अध्याय हमें सिखाता है कि दिव्य ज्ञान कालातीत है और हर कर्म तभी पवित्र बनता है जब उसे ज्ञान और कर्तव्यभाव के साथ किया जाए।
(भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को दिव्य ज्ञान देते हुए)
भगवान के अवतार का रहस्य
श्लोक 4.7–8
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत ।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदाऽअत्मानं सृजाम्यहम् ॥
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् ।
धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे ॥
भावार्थ:
भगवान कहते हैं — “हे अर्जुन! जब-जब धर्म की हानि होती है और अधर्म बढ़ता है, तब मैं अवतार लेता हूँ।
सज्जनों की रक्षा, दुष्टों के विनाश और धर्म की स्थापना के लिए मैं युग-युग में प्रकट होता हूँ।”
संदेश:
ईश्वर संसार में संतुलन बनाने के लिए स्वयं अवतार लेते हैं।
दिव्य ज्ञान की परंपरा
श्लोक 4.1–2
इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम् ।
विवस्वान्मनवे प्राह मनुरिक्ष्वाकवेऽब्रवीत् ॥
एवं परम्पराप्राप्तमिमं राजर्षयो विदुः ।
स कालेनेह महता योगो नष्टः परन्तप ॥
भावार्थ:
भगवान बताते हैं कि यह योग अति प्राचीन है।
यह सूर्यदेव को दिया गया, फिर मनु को, फिर इक्ष्वाकु को।
समय के साथ यह ज्ञान लुप्त हो गया।
संदेश:
गीता का ज्ञान सनातन है—यह किसी युग का नहीं, बल्कि सभी युगों का मार्गदर्शक है।
भगवान जन्मरहित होकर भी अवतार लेते हैं
श्लोक 4.6
अजोऽपि सन्नव्ययात्मा भूतानामीश्वरोऽपि सन् ।
प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय सम्भवाम्यात्ममायया ॥
भावार्थ:
भगवान कहते हैं— “मैं अजन्मा और अविनाशी हूँ, सब प्राणियों का स्वामी हूँ, फिर भी अपनी दिव्य शक्ति से अवतार लेता हूँ।”
संदेश:
भगवान का अवतार मानव की तरह नहीं होता — वह दिव्य और अलौकिक होता है।
ज्ञान का सर्वोच्च महत्व
श्लोक 4.33
श्रेयान्द्रव्यमयाद्यज्ञाज्ज्ञानयज्ञः परन्तप ।
सर्वं कर्माखिलं पार्थ ज्ञाने परिसमाप्यते ॥
भावार्थ:
“हे अर्जुन! दान और कर्म से बढ़कर ज्ञान का यज्ञ श्रेष्ठ है।
क्योंकि सभी कर्म अंततः ज्ञान में ही पूर्ण होते हैं।”
संदेश:
ज्ञान जीवन को दिशा देता है और कर्म को सार्थक बनाता है।
गुरु के माध्यम से ज्ञान की प्राप्ति
श्लोक 4.34
तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया ।
उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः ॥
भावार्थ:
भगवान कहते हैं — “विनम्रता, सेवा और सच्चे प्रश्नों के द्वारा गुरु से ही ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है।
तत्त्वदर्शी गुरु ही सत्य ज्ञान देते हैं।”
संदेश:
गुरु मार्गदर्शन के बिना आध्यात्मिक यात्रा संभव नहीं।
ज्ञान की शक्ति — अज्ञान का दहन
श्लोक 4.37
यथैधांसि समिद्धोऽग्निर्भस्मसात्कुरुतेऽर्जुन ।
ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात्कुरुते तथा ॥
भावार्थ:
जैसे अग्नि लकड़ी को भस्म कर देती है,
वैसे ही ज्ञान अज्ञान और पाप रूपी कर्मों को पूरी तरह नष्ट कर देता है।
संदेश:
ज्ञान ही मनुष्य का वास्तविक उद्धार करता है।
श्रद्धा और संयम से ज्ञान की प्राप्ति
श्लोक 4.39
श्रद्धावान् लभते ज्ञानं तत्परः संयतेन्द्रियः ।
ज्ञानं लब्ध्वा परां शान्तिमचिरेणाधिगच्छति ॥
भावार्थ:
जो व्यक्ति श्रद्धा रखता है और इन्द्रियों को संयमित करता है, वह ज्ञान प्राप्त करके परम शांति पाता है।
संदेश:
श्रद्धा + संयम + सेवा = ज्ञान → शांति
ज्ञान योग का सार निष्कर्ष
- ज्ञान ही मानव जीवन का वास्तविक प्रकाश है।
- कर्म तब पवित्र होता है जब वह फल-रहित (निष्काम) हो।
- गुरु की शिक्षा और उनकी शरण ही ज्ञान का द्वार खोलती है।
- ईश्वर अवतार लेते हैं धर्म की रक्षा हेतु।
- ज्ञान अज्ञान को पूरी तरह नष्ट करता है।
FAQ
Q1. चतुर्थ अध्याय को ‘ज्ञान योग’ क्यों कहा जाता है?
क्योंकि इसमें भगवान ज्ञान, कर्म, अवतारवाद और गुरु-परंपरा का सार बताते हैं।
Q2. भगवान अवतार क्यों लेते हैं?
धर्म की रक्षा और दुष्टों के विनाश के लिए।
Q3. ज्ञान कैसे प्राप्त होता है?
गुरु की सेवा, प्रश्न और श्रद्धा से।
Q4. ज्ञान योग किसे कहा गया है?
जिस मार्ग से अज्ञान नष्ट होकर सच्चा ज्ञान प्राप्त हो — वह ज्ञान योग है।
Q5. इस अध्याय का मुख्य संदेश क्या है?
निष्काम कर्म और दिव्य ज्ञान ही मुक्ति का मार्ग है।
Category: Bhagavad Gita | Krishna Teachings | Spiritual Wisdom
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