Author: BhaktiParv.com
भूमिका
श्रीमद्भगवद्गीता का दूसरा अध्याय — “सांख्य योग” — सम्पूर्ण गीता का हृदय माना गया है।
यहीं से भगवान श्रीकृष्ण का उपदेश आरंभ होता है।
अर्जुन के विषाद और मोह को दूर कर, श्रीकृष्ण उन्हें आत्मज्ञान, कर्मयोग, और स्थिरबुद्धि की शिक्षा देते हैं।
यह अध्याय हमें बताता है कि सच्चा ज्ञान वही है जो जीवन में धैर्य, समत्व और कर्तव्य भावना जगाता है।
(अर्जुन का विषाद और श्रीकृष्ण की मुस्कान)
श्लोक 2.1
सञ्जय उवाच —
तं तथा कृपयाविष्टमश्रुपूर्णाकुलेक्षणम् ।
विषीदन्तमिदं वाक्यमुवाच मधुसूदनः ॥
भावार्थ:
संजय ने कहा — उस समय करुणा से भरे, आँसुओं से लबरेज नेत्रों वाले, विषादग्रस्त अर्जुन से भगवान श्रीकृष्ण ने कहा।
श्लोक 2.2–3
श्रीभगवानुवाच —
कुतस्त्वा कश्मलमिदं विषमे समुपस्थितम् ।
अनार्यजुष्टमस्वर्ग्यमकीर्तिकरमर्जुन ॥
क्लैब्यं मा स्म गमः पार्थ नैतत्त्वय्युपपद्यते ।
क्षुद्रं हृदयदौर्बल्यं त्यक्त्वोत्तिष्ठ परन्तप ॥
भावार्थ:
भगवान श्रीकृष्ण बोले — “हे अर्जुन! यह मोह और दुर्बलता तुझ पर कैसे छा गई?
यह न तो आर्य पुरुषों के योग्य है, न स्वर्ग दिलाने वाला, और न ही कीर्ति देने वाला।
इस हृदय की कमजोरी को त्यागकर उठ खड़ा हो, हे परंतप!”
यहाँ से “ज्ञान योग” की शुरुआत होती है — जहाँ भगवान अर्जुन को कर्म, आत्मा और धर्म का ज्ञान देते हैं।
(आत्मा की अमरता का उपदेश)
श्लोक 2.11–12
श्रीभगवानुवाच —
अशोच्यानन्वशोचस्त्वं प्रज्ञावादांश्च भाषसे ।
गतासूनगतासूंश्च नानुशोचन्ति पण्डिताः ॥
न त्वेवाहं जातु नासं न त्वं नेमे जनाधिपाः ।
न चैव न भविष्यामः सर्वे वयमतः परम् ॥
भावार्थ:
भगवान ने कहा — “तू उन लोगों के लिए शोक कर रहा है जो शोक के योग्य नहीं हैं।
ज्ञानी न तो जीवितों के लिए शोक करते हैं, न मृतकों के लिए।
क्योंकि न मैं कभी न था, न तू, न ये सब राजा — और न ही आगे कभी न रहेंगे। आत्मा सदा रहती है।”
संदेश: आत्मा न जन्म लेती है, न मरती है। शरीर बदलता है, पर आत्मा अमर है।
(आत्मा नाशरहित और शाश्वत है)
श्लोक 2.20
न जायते म्रियते वा कदाचित् ।
नायं भूत्वा भविता वा न भूयः ।
अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो ।
न हन्यते हन्यमाने शरीरे ॥
भावार्थ:
“आत्मा का न कभी जन्म होता है और न मृत्यु। वह नित्य, शाश्वत, और अविनाशी है।
शरीर के नाश होने पर भी आत्मा नहीं मरती।”
संदेश: जो आत्मा को जान लेता है, वह मृत्यु के भय से मुक्त हो जाता है।
(कर्तव्य और कर्मयोग का संदेश)
श्लोक 2.31–33
स्वधर्ममपि चावेक्ष्य न विकम्पितुमर्हसि ।
धर्म्याद्धि युद्धाच्छ्रेयोऽन्यत्क्षत्रियस्य न विद्यते ॥
यदि त्वमिमं धर्म्यं संग्रामं न करिष्यसि ।
ततः स्वधर्मं कीर्तिं च हित्वा पापमवाप्स्यसि ॥
भावार्थ:
“हे अर्जुन! अपने धर्म को देखकर तू विचलित न हो।
क्षत्रिय के लिए धर्मयुद्ध से बढ़कर कोई श्रेष्ठ कार्य नहीं।
यदि तू अपने धर्म का पालन नहीं करेगा, तो तू पाप और अपकीर्ति का भागी बनेगा।”
संदेश: अपने कर्तव्य से भागना अधर्म है। धर्म का पालन करना ही सच्चा कर्मयोग है।
(समत्व योग – सफलता और असफलता में संतुलन)
श्लोक 2.47
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन ।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि ॥
भावार्थ:
“तेरा अधिकार केवल कर्म करने में है, फलों में कभी नहीं।
इसलिए फल की चिंता मत कर, और न ही अकर्म में आसक्त हो।”
संदेश: कर्म करते रहो, परिणाम ईश्वर पर छोड़ दो। यही सच्चा योग है।
(स्थिरबुद्धि योग – ज्ञान और शांति का मार्ग)
श्लोक 2.55–56
प्रजहाति यदा कामान्सर्वान्पार्थ मनोगतान् ।
आत्मन्येवात्मना तुष्टः स्थितप्रज्ञस्तदोच्यते ॥
दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः ।
वीतरागभयक्रोधः स्थितधीर्मुनिरुच्यते ॥
भावार्थ:
“जब मनुष्य मन की सभी इच्छाओं को त्यागकर आत्मा में ही संतुष्ट हो जाता है,
तब वह स्थितप्रज्ञ कहलाता है।
जो दुख में विचलित नहीं होता और सुख में आसक्त नहीं होता — वही स्थिर बुद्धि योगी है।”
संदेश: सच्चा ज्ञान मन की स्थिरता में है, न कि बाहरी परिस्थितियों में।
(ज्ञान योग का सार)
भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को समझाया कि कर्म से भागना समाधान नहीं है।
सच्चा योग है — निष्काम कर्म, अर्थात कर्म करना बिना फल की अपेक्षा के।
आत्मा अमर है, शरीर नश्वर।
जो आत्मा को जान लेता है, वह भय, मोह, और दुख से मुक्त हो जाता है।
Final Thoughts
“दूसरा अध्याय – सांख्य योग (ज्ञान योग)”
पूरे गीता संदेश का आधार है।
यह अध्याय हमें सिखाता है कि जीवन में जो भी करो, उसे कर्तव्य और समत्व भाव से करो।
फल की चिंता नहीं — क्योंकि हर कर्म का परिणाम ईश्वर के हाथ में है।
जब मन स्थिर हो, तब सच्चा ज्ञान उदित होता है।
यह अध्याय हर युग में उतना ही प्रासंगिक है —
क्योंकि आत्मज्ञान ही सच्चा मोक्ष है।
FAQ
Q1. दूसरा अध्याय “सांख्य योग” कहलाता क्यों है?
क्योंकि इसमें भगवान श्रीकृष्ण आत्मा, कर्म, और ज्ञान का विवेचन करते हैं — यही सांख्य दर्शन है।
Q2. श्रीकृष्ण ने अर्जुन को क्या सिखाया?
कर्म करते रहो, परिणाम की चिंता मत करो — यही निष्काम कर्मयोग है।
Q3. आत्मा के बारे में क्या बताया गया है?
आत्मा न जन्म लेती है, न मरती है। वह शाश्वत और अमर है।
Q4. “कर्मण्येवाधिकारस्ते” का अर्थ क्या है?
मनुष्य का अधिकार केवल कर्म करने में है, फल में नहीं।
Q5. स्थिरबुद्धि योगी कौन होता है?
जो सुख-दुख में समान रहता है और मन को ईश्वर में स्थिर करता है, वही स्थितप्रज्ञ है।
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